इस खेल में खिलाड़ियों के दो पक्ष बनते हैं। दोनों दलों में खिलाड़ियों की संख्या समान होती है। किशोरों और बालकों में यह काफी लोकप्रिय है। हड़दड़ो खेलने से पहले मैदान में तकरीबन डेढ़ मीटर की दूरी रखते हुए रेत की दो छोटी ढेरियां बनाई  जाती हैं। इन पर दो पत्थर रखकर एक लंबी लाठी रखी जाती है। इसे हड़दड़ा कहा जाता है। इसके बाद दोनों तरफ पैरों के डग भरते हुए पांच-छ: मीटर के पाले बना लिए जाते हैं। फिर दोनों दलों का एक खिलाड़ी खेलने के लिए प्रस्तुत हो जाता है। वह गेंद को लाठी की तरफ फेंकता है। यदि गेंद लाठी पर लग जाती है तो सामने वाले पक्ष का एक खिलाड़ी मृत मान लिया जाता है। फिर उसके स्थान पर दूसरा खिलाड़ी प्रस्तुत होता है। गेंद को सामने वाले पक्ष के खिलाड़ी द्वारा बीच में दबोच लेने पर फेंकने वाला खिलाड़ी मृत माना जाता है।

इस खेल में दोनों दलों में से किसी एक दल के तमाम खिलाड़ी मर जाते हैं तो विजयी पक्ष के खिलाड़ी उनको गेंद को लाठी से हांकते हुए पिदाते (छकाते) हैं। यदि इसी दौरान गेंद पिदने वाले पक्ष के किसी खिलाड़ी द्वारा दबोच ली जाती है तो गेंद को हांकने वाला खिलाड़ी मृत माना जाता है। जब तक पिदाने वाले पक्ष के सभी खिलाड़ी बैठ नहीं जाते, तब तक यह चलता रहता है। सभी पिदाने वालों के बैठ जाने के बाद खेल का एक भाग पूरा हो जाता है। इसके बाद खेल का अगला चरण इसी भांति शुरू होता है। हड़दड़ो के खेल के दौरान वाणी-विलास चलता रहता है।

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