जयपुर से तकरीबन 75 किलोमीटर दूर राजस्थान के टोंक जिले में डिग्गी नामक स्थान पर वैशाख पूर्णिमा और भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन मेला भरता है पर सावन माह में भरने वाले मेले का खास महत्व है। डिग्गी राजस्थान का सबसे चर्चित और लोकप्रिय तीर्थ है। इस मेले में राजस्थान के अलावा बंगाल, बिहार और आसाम आदि प्रदेशों के श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए श्री कल्याण जी से विनती करने के लिए आते हैं। श्री कल्याण जी को भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है और भक्तों में उनकी काफी मान्यता है। यही कारण है कि अनेक लोग प्रतिवर्ष इस स्थल पर आकर अपनी आस्था प्रदर्शित करते हैं।
डिग्गी कल्याण जी के बारे में एक लोककथा बहुश्रुत है कि एक बार देवराज इंद्र ने अपने दरबार की अप्सरा उर्वशी को किसी बात पर क्रुद्ध होकर बारह वर्ष के लिए मृत्यु लोक में रहने का दंड दे दिया। दंड के बाद उर्वशी मृत्युलोक में आकर रहने लगी। वह पहले सप्तऋषियों के आश्रम में रही और बाद में चंद्रगिरि नामक जगह आ गयी। चंद्रगिरि के राजा के बाग में रात में वह घोड़ी का रूप धारण करके चरा करती थी। अपने बाग का विध्वंस देखकर राजा क्रोधित हो गया और उसने घोषणा की कि जिस व्यक्ति के पास वह घोड़ी मिले, वही इसे पकड़ ले। संयोग से वह घोड़ी चंद्रगिरि के राजा के पास ही निकली। राजा ने उसे पकड़ना चाहा पर वह बचकर निकल गयी। राजा ने उसका पीछा किया। जब घोड़ी एक पर्वत पर पहुंची तो उसने सुंदरी का रूप धारण कर लिया। उसका अनुपम रूप देखकर राजा डिग्व उसके मोहपाश में बंध गया और उसे अपने महल में लाने को आतुर हो उठा। उसकी बात सुनकर उर्वशी महल में आने को तैयार हो गयी पर उसने शर्त रखी कि दंड की अवधि समाप्त होने पर राजा इंद्र उसे वापस लेने आये तो वह उसकी रक्षा करे। यदि वह ऐसा करने में विफल रहा तो उसे श्राप झेलना पड़ेगा। राजा ने उसकी बात मान ली और उसे महल में ले आया।
दंड की अवधि समाप्त होने के बाद देवराज इंद्र उर्वशी को वापस लेने के लिए मृत्यु लोक में आया। डिग्व और इंद्र का युद्ध हुआ जिसमें भगवान विष्णु की सहायता से इंद्र विजयी रहा। विजयी होने के बाद इंद्र उर्वशी को ले गया। जाते समय उर्वशी ने डिग्व को कोढ़ी होने का श्राप दिया। भगवान विष्णु को डिग्व पर दया आ गयी और उन्होंने राजा को कुष्ठ से मुक्त होने का उपाय बताया। उन्होंने कहा कि कालांतर में उनकी एक प्रतिमा पास के समुद्र में प्रवाहित होते हुए यहां तक आयेगी जिसके दर्शन से राजा का कुष्ठ रोग दूर हो जायेगा। नियत समय पर वह प्रतिमा वहां पहुंची जिसका दर्शन करते ही राजा रोगमुक्त हो गया। इसके बाद राजा डिग्व ने प्रतिमा को अपने रथ में रखवाया और घोड़ों के स्थान पर स्वयं जुतकर एक स्थान पर स्थापित करने के लिए ले गया। प्रतिमा को स्थापित करके राजा ने भगवन विष्णु का श्री कल्याण जी मंदिर बनवाया। भगवान विष्णु ने राजा डिग्व को रोगमुक्त करके उनका कल्याण किया था जिसके आधार पर ही इस मंदिर का नाम कल्याण मंदिर रखा गया।