सांभर एक प्राचीन कस्बा है, जो जयपुर जिले में स्थित फुलेरा जंक्शन से 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। देवयानी और शर्मिष्ठा के पवित्र कुण्डों के कारण इसकी प्राचीन काल में बड़ी प्रसिद्धि रही है। यह प्रसिद्ध है कि यह वही कुण्ड है जिसमें राजकुमारी शर्मिष्ठा ने देवयानी को फेंक दिया था। देवयानी आगे चलकर महाराज ययाति की राजरानी बन गयी थी। प्राचीन नगर जो अब सारथ के नाम से प्रसिद्ध है— वर्तमान सांभर में 18-19 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है। चौहान शासक वासुदेव ने 7वीं शती में इसकी स्थापना की थी। शाकम्भरी माता के मन्दिर के पास बस्ती बसायी गयी थी। शाकम्भरी के नाम से यह स्थान प्रसिद्ध रहा। वासुदेव से इस झील का सम्बन्ध बताने वाली लोककथाएँ प्रचलन में हैं। वासुदेव के पश्चात् उसका पुत्र सामन्त शासक बना। इसकी एकरूपता कथाओं में आए मानकदेव चौहान से की जा सकती है।

 

डॉ. दशरथ शर्मा ‘पृथ्वीराज विजय’ के चौथे अध्याय का प्रसंग देते हुए कहते हैं कि विद्याधर ने वासुदेव को झील भेंट स्वरूप प्रदान की। विद्याधर को वासुदेव ने प्रसन्न होकर अपना मित्र बना लिया था। बिजौलिया शिलालेख के अनुसार झील को विद्याधर ने उत्पन्न किया था।

 

प्रबन्ध कोष के अनुसार वासुदेव का समय विक्रमी 608 (ई. 551) है। इस तिथि के औचित्य पर निर्णय करना चाहिए। डॉ. डी.आर. भण्डारकर ने वासुदेव वाहयान के सिक्के के आधार पर उसका समय विक्रमी 627 माना है। वे वासुदेव वाहयान को वासुदेव चौहान से एकीकृत करते हैं।

 

प्रारम्भ में सांभर कुछ झोंपड़ियों का समूह मात्र था और इसने गाँव या कस्बे का रूप धारण नहीं किया था। चौहानों के शासनकाल में इस स्थान की अभूतपूर्व उन्नति हुई और यह उत्तरी भारत का प्रमुख नगर बन गया। सांभर की नमक की झील आय का एक प्रमुख साधन बन गयी। हर्ष शिलालेख के अनुसार सांभर के व्यापारी एक नमक की ढेरी के पीछे एक विंशोपक और एक घोड़े के पीछे एक द्रम हर्षनाथ मन्दिर के लिए देते थे।

 

सांभर की नमक की झील की उत्पत्ति का विवरण ऊपर दिया गया है। यह परम्परा पर आधारित विवरण है जो लोककथाओं से जुड़ा है। भू-वैज्ञानिकों की मान्यतानुसार झीलों का यह प्रदेश चट्टानों से भरा-पूरा है, जिनमें चूने के पत्थर बहुतायत में मिलते हैं। इन्हीं च‌ट्टानों से घुलकर नमक उत्पन्न होता है। हॉलैण्ड और क्रिस्टे विन्डबोर्न घियरी के समर्थक हैं, जो कच्छ से सांभर तक लागू होती है। एन.एन. गोडबोले ने एक नए सिद्धान्त की स्थापना करते हुए इसे सही नहीं माना। उनके अनुसार राजस्थान के कुओं में जो नमक है वह समुद्री नमक और सतही नमक नहीं है, जो दक्षिणी-पश्चिमी हवाओं से उड़कर आया है। गोडबोले की इस मान्यता का समर्थन मेट्रोलोजिकल विभाग के प्रमानिक ने किया है।

 

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि प्रारम्भिक चौहान शासक प्रतिहारों के सामन्त के रूप में शासन करते थे। दुर्लभराज प्रथम के लिए प्रसिद्ध है कि अपने स्वामी के साथ होने वाले बंगाल के धर्मपाल के युद्ध में उसने महत्त्वपूर्ण भाग लिया था। इस समय वह गंगासागर तक पहुँचा था। उसका पुत्र गूवक प्रतिहार नरेश नागभट्ट द्वितीय की सभा का लब्धप्रतिष्ठ सरदार था। उसकी मुठभेड़ सिन्ध के मुसलमानों से भी हुई थी। सिंहराज पहला चौहान शासन था जिसने अपने आप को प्रतिहारों से स्वतन्त्र कर लिया। हर्षनाथ मन्दिर को उसने कई गाँव भेंट में चढ़ाए थे। उसके पुत्र विग्रहराज द्वितीय ने चालुक्य शासक मूळराज को हराया था। यह बात हमें 'पृथ्वीराज विजय' काव्य से ज्ञात होती है। अगले शासक दुर्लभराज ने नाडोल पर आक्रमण किया। उसका पुत्र गोविन्दराज का महमूद गजनी से संघर्ष हुआ था पर उसकी कोई बड़ी हानि नहीं हुई। उसके पुत्र वाक्पतिराज द्वितीय ने गुहिल अम्बाप्रसाद जो आघाट का राजा था, को हराया। वीर्यरामा जो अगला शासक था— परमार भोज के साथ हुई लड़ाई में मारा गया। अगला शासक पृथ्वीराज प्रथम 1105 ई. में शासन करता था। उसने सात हजार चालुक्यों को जो पुष्कर में ब्राह्मणों को लूटने आए थे, मार डाला। उसने रणथम्भौर के जैन मन्दिर को स्वर्ण कलश चढ़ाए थे। उसके पुत्र अजयराज ने अजमेर की स्थापना की। इस समय से सांभर राजधानी नहीं रहा। अब अजमेर को राजधानी बनाया गया। जयसिंह सिद्धराज के तिथि रहित शिलालेख से ज्ञात होता है कि उसने अर्णोराज के समय सांभर पर अधिकार कर लिया था। सांभर में चौहानों द्वारा निर्मित प्राचीन दुर्ग के अवशेष पाए गए हैं। मुगलकाल में यह विद्यमान था। दुर्ग के पास सुन्दर तक्षण कला से युक्त स्तम्भ पाए गए है। असिताराम से निर्मित अर्द्ध स्तम्भ भी मिले हैं। ये किसी मन्दिर से सम्बन्धित थे। इन स्तम्भों से वैष्णव मन्दिर की दसवीं शती में उपस्थिति का पता चलता है। इस मन्दिर की छः प्रतिमाएँ विष्णु के स्वरूप की थीं, एक वामनावतार से सम्बन्धित थी और एक शिव से सम्बन्धित थी। ये सभी प्रतिमाएँ सुन्दर स्वरूप वाली थीं। इन मूर्तियों का अलंकरण और अन्य बातें अपनी अप्रतिमता लिए हुए थी, जो उस काल की अन्य मूर्तियों में दिखायी नहीं देती है। सन् 1192-93 में पृथ्वीराज तृतीय की पराज्य के पश्चात् सांभर विभिन्न राजकुलों के अधिकार में रहा। सन् 1198 में यह दिल्ली सुल्तानों के अधिकार में रहा। बाल्हनदेव के समय इसकी स्वतन्त्र स्थिति रही। उसका राज्य मंगलाना, जो सांभर से 24 किलोमीटर की दूरी पर है, तब फैला हुआ था। वह 1215 ई. में शासन कर रहा था और सुल्तान इल्तुतमिश का करद सामन्त था। सन् 1226 में सुल्तान इल्तुतमिश ने रणथम्भौर और सांभर पर आक्रमण किया था। हम्मीर जो रणथंभौर का शासक था—दिग्विजय प्रसंग में सांभर आया था और लूटमार करता यहाँ से रणथम्भौर लौट गया था शार्ङ्गधर पद्धति में जिसका प्रणयन 1363 ई. में हुआ था, हम्मीर को शाकम्भरी का शासक बतलाया गया है।

 

1363 के शिलालेख से ज्ञात होता है कि फिरोजशाह के अधिकार में सांभर रहा था। इस लेख में वामदेव के उद्योग से एक कुएँ के निर्माण की बात कही गयी हैं। एक अन्य लेख से ज्ञात होता है कि पद्मा नामक एक व्यक्त्ति ने सांभर में एक बड़ा विशाल जैन मन्दिर बनाया था। सांभर पर महाराणा मोकल का अधिकार भी रहा था, जिसे नागौर के शासक शम्भ खाँ ने दूर कर दिया था। 'वीर विनोद' के अनुसार महाराणा मोकल के पुत्र कुम्भा ने सांभर पर फिर अधिकार कर लिया था।

 

मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में सांभर की बड़ी उन्नति हुई। बिहारीमल की पुत्री की शादी अकबर के साथ यहीं सम्पन्न हुई थी। जहाँगीर ने शाकम्भरी मन्दिर के पास की पहाड़ी में एक मकबरा बनाया था। शाहजहाँ ने यहाँ सन् 1634 में एक सराय बनायी थी। औरंगजेब ने चौहानों के प्राचीन दुर्ग का सन् 1695 में पुनरुद्धार करवाया था। आगे के काल में सांभर उदयसिंह नामक व्यक्ति के अधिकार में रहा था। जयपुर और जोधपुर के सीमान्त में स्थित होने के कारण दोनों प्रदेशों के राजाओं की इस पर नजर रहती थी। इसके अलावा नमक की बड़ी आय थी। सांभर के तत्कालीन गवर्नर उदयसिंह को जयपुर बुलाकर धोखे से कैद कर लिया गया। मुगल सत्ता कमजोर थी, अतः कुछ कर नहीं सकी। सांभर पर जोधपुर और जयपुर का सम्मिलित अधिकार रहा। उदयसिंह ने अपने इष्टदेव बिहारीजी का मन्दिर देवयानी में बनाया था। इसकी पूजा आज भी ब्राह्मण पुजारी करते हैं। इसकी दीवार पर एक फारसी शिलालेख लगा है।

 

ऊपर के पृष्ठों में सांभर के राजनीतिक इतिहास पर प्रकाश डाला गया है। सांभर अपनी पुरातात्त्विक सम्पदा के लिए विख्यात रहा है। यहाँ पर उत्खनन से अनेक प्राचीन महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ मिली हैं, जिनका विवरण आगे दिया जा रहा है।

 

सांभर जयपुर से लगभग 60 किलोमीटर पश्चिम की ओर अवस्थित है। चौहानों का यह प्रमुख केन्द्र रहा है। इस स्थल की प्राचीनता की ओर सर्वप्रथम राजस्व आयुक्त लायन का ध्यान गया था। सन् 1885 में कर्नल हैण्डले ने परीक्षण के तौर पर इस स्थान पर उत्खनन करवाया था। उस समय जो सामग्री मिली उससे यह बात पुष्ट हो गयी कि यहाँ बौद्ध धर्मावलम्बियों का केन्द्र था। दयाराम साहनी ने सन् 1936-38 में सांभर के एक बड़े टीले का उत्खनन करवाया था। इस टीले का माप 2000 × 1800 फीट था। यहाँ के विभिन्न स्तरों से जो सामग्री प्राप्त हुई, उसमें मनुष्य एवं पशुओं की मूर्तियाँ, आहत सिक्के, यौधेय, इण्डोग्रीक तथा कुषाणकालीन सिक्के उल्लेखनीय थे। प्राप्त सामग्री के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि तीसरी शती ईसा पूर्व से ई. दसवीं शती तक यह स्थान महत्वपूर्ण रहा है।

 

सांभर के विभिन्न स्तरों से कुषाणकालीन मृण्मूर्तियों मिली हैं। इनसे कुषाण कला के बारे में अच्छी जानकारी प्राप्त होती है। सांभर के उत्खनन से विभिन्न आवासीय भवनों से कुषाणकालीन पुरावशेषों की प्राप्ति हुई है। मकान नं. 6 सर्वाधिक सुरक्षित है। यहाँ मृण्मय घड़े के हत्थे पर एक यक्ष की सुन्दर मूर्ति है जो कमल के फूल पर खड़ा है। इसके एक हाथ में कमल कली है तथा दूसरे हाथ में एक माला है। कुषाण कला का यह एक उत्तम उदाहरण है। यहाँ एक वर्गाकार मृद्भाण्ड का टुकड़ा भी मिला है, जिस पर पूरे विकसित कमल के फूल पर एक यक्ष दोनों ओर पैर लटकाए बैठा है। इसकी समता मथुरा के कुषाणकालीन स्तम्भों के चित्रण से की जा सकती है। एक हाथ से बनाई हुई चिकनी मिट्टी की पुरुष प्रतिमा है जो तिपाई पर आसीन है। यह मथुरा की यक्ष प्रतिमा से मेल रखती है। कुषाण कला की यह एक रम्य कृति है।

 

सांभर का दूसरा काल प्रथम शती ई. पूर्व माना गया है। इस काल में एक पुरुषाकृति मिली है, जिसके हाथ में डमरु और गले में सर्पों की माला है। इसे शिव से समीकृत किया जा सकता है। साहनी ने इसे कुषाणकालीन मृण्मय कला बताया है। एक पात्रहस्ता नारी की मूर्ति भी मिली है, जिसके सर पर एक शिरस्त्राण है। इसे देवी बताया गया है। ये सभी मूर्तियाँ साँचे से निर्मित हैं और बड़ी संख्या में हैं। इन्हें किसी दीवार पर लगाने हेतु लगाया गया होगा। इसमें सबसे प्राचीन एक यक्ष की मूर्ति का ऊर्ध्व भाग है, जो ई. पूर्व प्रथम शती का माना गया है। नग्नावस्था में स्तम्भासीन यक्ष की मूर्ति भी मिली है। सूर्यदेव को स्थासीन दिखाया गया है। एक भैंसे के सिर वाली पुरुषाकृति है, जिसके दाहिने हाथ में माला है। ह्यग्रीव व अग्नि से समीकृत की जाने वाली मृण्मय मूर्तियाँ भी मिली हैं। साँचे में पहले इन्हें ढाल कर फिर नाक, कान आदि लगाए गए हैं। ये विविध रंगों में चित्रित हैं। यक्ष, यक्षी, दुर्गा, महेश, भैरव, अर्द्ध पुरुष, नारी, पशु, पक्षी तथा शिशुओं की मूर्तियाँ भी खनन से प्राप्त हुई हैं।

 

जैसा कि पूर्व में कहा गया है कि सांभर की खुदाई में प्राप्त मृण्मय मूर्तियों में अधिकांश कुषाण एवं गुप्तकालीन हैं। ये मूर्तियाँ राजकीय संग्रहालय आमेर में सुरक्षित हैं। यहाँ से प्राप्त एक अलंकृत सुराही पूर्व गुप्तयुगीन है। सुराही के हैण्डल और गर्दन पर दैवी आकृतियाँ साँचे में ढाल कर बनायी गयी हैं। रोमन धातु कला सामग्री के प्रभाव से मृण्मूर्ति कला में भारतीय अभिप्राय सांभर की मूर्तियों में दर्शाए गए हैं। ऐसे पात्र मंगल कार्यों में अत्यल्प मात्रा में काम में लिए जाते थे।

 

सांभर की झील की व्यवस्था जयपुर और जोधपुर के महाराजाओं द्वारा की जाती थी। इस झील से देश के नमक की 14 प्रतिशत पूर्ति की जाती थी। इस झील में 700 से अधिक वर्षों से नमक का उत्पादन किया जा रहा है और म्यार, पेन, रेस्टा एवं आयोडीन युक्त नमक की किस्में रही हैं। इस झील के भण्डारों के बारे में कहा गया है कि झील की ऊपरी 12 फीट की परत में बड़ी मात्रा में नमक विद्यमान है। इससे कई उद्योग पनप सकते हैं। यहाँ का नमक समुद्री जल से उत्पादित नमक से कई गुना क्षारयुक्त है। यह नमक श्वेत, गुलाबी और सलेटी रंग में होता है। सांभर, नांवा और गुढ़ा तीनों कस्बे झील के कब्जे में चली गयी। सन् 1835 में यह झील अंग्रेजों के कब्जे में चली गई। यह सन् 1844 तक उनके अधिकार में रही। सन् 1870 में फिर इसका ठेका अंग्रेज सरकार को दे दिया गया। पुराना सांभर कस्बा ईसा पूर्व तीन सौ में बनाया गया था। जो दसवीं शती तक फला-फूला। नया नगर खारे पानी की झील के किनारे बसाया गया। यहाँ कठोर पत्थर की कटाई और पालिश का कार्य खूब भली प्रकार चला। नमक उद्योग भी खूब फला-फूला। यहाँ के लोग कलात्मक पोटरी बनाने का काम भी कुशलतापूर्वक करने लगे। यहाँ देवयानी कुण्ड से काले रंग के पत्थर की एक अतीव प्राचीन मूर्ति मिली थी। इस कुण्ड के पास दसवीं शती में बना एक प्राचीन मन्दिर है। कुण्ड के चारों ओर 19 मन्दिर बने हुए हैं, जिनमें चार शिव मन्दिर हैं, जो चारों कोनों पर बने हैं।

 

उपर्युक्त विवरण से सांभर की पुरातत्त्वीय सम्पदा का महत्त्व समझा जा सकता है। सांभर एक ऐसा प्रसिद्ध पुरा सामग्री से समाहित स्थान है, जिसका इतिहास बड़ा गौरवपूर्ण रहा है। सांभर की पुरा सम्पदा ने कुषाणकालीन कला के अनुपम उदाहरण उपस्थित किए हैं।

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