यह नगर एक प्राचीन ऐतिहासिक नगर है, जिसका महाभारत में पाण्डवों के प्रसंग में कई बार उल्लेख हुआ है। कौरवों से द्यूत में पराजित होकर पाण्डवों ने अपना अज्ञातवास यहीं पर बिताया था। यह नगर अपने गौ धन के लिए उस समय विख्यात था। यह नगर मत्स्य देश की राजधानी होने का गौरव प्राप्त कर चुका है।

 

विराट नगर जयपुर से उत्तर दिशा में प्रायः 66 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है। यह लगभग आठ किलोमीटर लम्बी तथा छः किलोमीटर चौड़ी एक घाटी में अवस्थित है। पास ही अनेक गिरि पंक्तियाँ फैली हैं, जो लाल रंग की हैं और ताम्र धातु के लिए प्रसिद्ध हैं। जिस घाटी में यह नगर अवस्थित है, वहाँ दो नाले अपना जल यहाँ लाते हैं। इनमें एक नाला बैराठ नाला और दूसरा बादराल नाला कहलाता है। वर्तमान विराट नगर एक टीले पर अवस्थित है, जिसके नीचे अनेक प्राचीन खण्डहर हैं। यह टीला डेढ़ किलोमीटर लम्बा और पौने किलोमीटर चौड़ा था।

 

बैराठ नगर का इतिहास अतीव प्राचीनकाल तक जाता है। हिन्दू कथाओं में यह मत्स्य देश की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध रहा है। जैसा कि इसके नाम से ज्ञात होता है, इस नगर को राजा विराट ने अपने नाम पर बसाया था। इसी नगर में पाण्डवों ने छद्म रूप धरकर एक वर्ष का अज्ञातवास का समय बिताया था। यहाँ आज भी सुदृढ परम्पराएँ और स्थान हैं जो पाण्डवों की स्मृति से जुड़े हैं। यहाँ भीम की डूंगरी है, जिसमें भीम का निवास माना जाता है। वह पहाड़ी भी विद्यमान है जहाँ कीचक का राजमहल स्थित था। इसके अलावा बाणगंगा है, जिसे अर्जुन ने अपने बाण से उत्पन्न किया था। इनके अतिरिक्त कौरवों द्वारा हरण कर ले जायी गयी गायों के खुरों के निशान भी हैं। पाण्डवों के साथ इस स्थान के सम्पर्क की कथा का ऐतिहासिक आधार महाभारत में आए प्रसंग हैं।

 

विराट नगर पुरातात्त्विक सामग्री से ओत-प्रोत है। इसका महाभारतकालीन संपर्क और बौद्धयुगीन सम्पर्क इसे एक महत्त्व प्रदान करता है। इस नगर की प्रारम्भिक खोज का कार्य कनिंघम, कार्लाइल एवं डॉ. भण्डारकर ने प्रारम्भ किया था जो सन् 1865 तक चलता रहा। कार्लाइल और भण्डारकर द्वारा किए गए कार्य सन् 1909-10 में सम्पन्न हुए थे। इनका वर्णन उनकी यात्रा विवरणों में प्रकाशित है। इस स्थान पर मिली प्राचीन सामग्री से उत्साहित होकर तत्कालीन जयपुर राज्य ने प्रख्यात पुराविद् रायबहादुर दयाराम साहनी को इस कार्य पर लगाया। श्री दयाराम साहनी ने सन् 1937 में विराट नगर में वृहत् स्तर पर उत्खनन कार्य करवाया। इस उत्खनन से महत्त्वपूर्ण सामग्री प्राप्त हुई, जिसमें बौद्ध मठ और बौद्ध मन्दिर की उपलब्धि विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इनके अतिरिक्त अन्य महत्त्वपूर्ण सामग्री के रूप में चर्टके फ्लेक तथा कोर आहत सिक्के, उत्तर भारत के कृष्ण मार्जित मृद्पात्र आदि मिले जो प्राचीनकालीन मानव जीवन पर उल्लेखनीय प्रकाश डालते है।

 

इस उत्खनन से पूर्व विराट नगर में सम्राट अशोक का मौर्यकालीन लघु पर्वतीय लेख खोज निकाला गया था। यह बैराठ चट्टान अभिलेख रूपनाथ सासाराम अभिलेख का एक त्रुटित रूप है। इसका पता कार्लाइल ने सन् 1871-72 में लगाया था। यह बैराठ से एक मील दूर उत्तर-पूर्वी भाग से प्राप्त हुआ था। यह लेख एक अलग-अलग चट्टान पर खुदा हुआ था, जो भीम डूँगरी के नीचे की ओर थी। खुदा हुआ खण्ड 17 फीट ऊँचा और पूर्व से पश्चिम 24 फीट लम्बा है। उत्तर से दक्षिण यह 15 फीट है। इस लेख का सम्पादन डॉ. बहुलर और सेनार्ट ने किया था।

 

इसके अलावा बैराठ च‌ट्टान अभिलेख भी यहाँ से खोज निकाला गया था। यह शिलालेख अब ऐशियाटिक सोसायटी बंगाल, कलकत्ता में सुरक्षित है। इसका पता बैराठ के पास की पहाड़ी पर सन् 1840 में कप्तान बर्ट ने लगाया था। कैप्टेन किटोई ने इसका लिथेग्राफ तैयार किया एवं लिप्यन्तरण और अनुवाद किया। इसका नाम भाभ्रु लेख भी है, क्योंकि यह भाभ्रु नामक गाँव में बीजक की पहाड़ी से प्राप्त हुआ था। भाभ्रु बैराठ में 12 मील दूरी पर अवस्थित है। गाँव के दक्षिण पूर्व की पहाड़ी बीजक डूँगरी के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ एक बौद्ध धर्म और संघ के प्रति निष्ठा और विश्वास का उल्लेख है (अशोक के दो महत्वपूर्ण शिलालेख मिलना इस नगर की प्राचीनता और उसके महत्त्व को प्रकट करता है)।

 

श्री साहनी ने बैराठ की पहाड़ी पर अपना उत्खनन कार्य प्रारम्भ किया, जिसकी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में एक वर्तुलाकार बौद्ध मन्दिर के अवशेष प्राप्त हुए। इस मन्दिर के स्तम्भ काष्ठ निर्मित थे। यहाँ एक बौद्ध विहार के अवशेष भी प्राप्त हुए। यह विहार बौद्ध भिक्षुओं और भिक्षुणियों के आवास के लिए ईसा की गई शताब्दी पूर्व बना था। मन्दिर स्थापत्य की दृष्टि से इष्टिका निर्मित बैराठ का यह बौद्ध मन्दिर मौर्ययुगीन स्थापत्य का अनुपम उदाहरण है।

 

हीनयान धर्म के काल में बुद्ध सम्बन्धी अवशेष किस प्रकार मन्दिर के बीच में स्थापित किए जाते थे तथा उनकी परिक्रमा के लिए प्रावधान किया जाता था, इसका पता मन्दिर की निर्माण विधि से लगता है। खुदाई से चौड़ी पक्की ईंटें भी प्राप्त हुई हैं जो मौर्ययुगीन संस्कृति का परिचय देती हैं। सबसे अधिक सुरक्षित मठ का पूर्व दिशा में अवस्थित भाग था। यहाँ पर छः सात कोठरियों के भग्नावशेष आज भी देखने को मिलते हैं। मिट्टी की ईंटें आकार में 20 x 1.75 है। इन्हें साधारण मिट्टी से जोड़ा गया था। मृदानिर्मित खपरैलों से छायी गयी थीं।

 

मृद्पात्रों में अलंकरण युक्त पात्र भी मिले हैं। अलंकरण में चक्र पर त्रिरत्न और स्वस्तिक के प्रतिरूप लगे थे। लोहे की कीलें, अण्डाकार घेरदार पतली तहों वाले पत्थर के छोटे फलक भी प्राप्त हुए थे। इनका प्रयोग ताबीज के रूप में किया जाता था। यहाँ खनन द्वारा मौर्यकालीन चमकीली मिट्टी के पात्र भी उपलब्ध हुए हैं, जो एन.बी.पी. के नाम से ज्ञात हैं। यहाँ से पोलिश वाले स्तम्भ व छत्र के खण्डित अंश भी प्राप्त हुए हैं। वर्तमान में ये आमेर संग्रहालय में सुरक्षित है।

 

इस उत्खनन से अनेक ऐसी वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं, जो बौद्ध भिक्षुओं के जीवन के विविध पक्षों पर सम्यक् प्रकाश डालती हैं। यहाँ से 36 आहत मुद्राएँ तथा भारतीय यूनानी सिक्के भी एक कपड़े में लपेटे में मिले हैं। मौर्यकालीन मृण्मय मूर्तियाँ भी प्रकाश में आयी हैं। इनमें सर्पफन धूपदान, धूप की बत्तियों के लिए बने छिद्रयुक्त मृद् वस्तुएँ, नर्तकी एवं यक्ष की मूर्तियों व मृदा निर्मित बेसबल जिस पर कटहरे का अंकन है आदि मिले है। चमकीले भिक्षा पात्रों के अवशेष, मृदा निर्मित थालियाँ, पूजा पात्र आदि भी उत्खनन से उपलब्ध हुए हैं। अन्य मठों के अवशेष प्राप्त हैं, जो तीन तरफ बने हुए थे। पश्चिम के भाग में दीवारों के तथा आँगनों के अवशेष अस्त व्यस्त रूप से बिखरे पडे हैं। दक्षिणी भाग में कोठरियों के कोई अवशेष नहीं हैं पर यहाँ भी पश्चिमी भाग वाली व्यवस्था थी, यह बात गलियारे की लम्बी दीवार से साबित है, जो आज भी यथावत् खड़ी है। मठ के उत्तरी पक्ष में केवल पुनर्निर्मित भवनों के अवशेष हैं।

 

बैराठ से प्राप्त बौद्धकालीन वस्तुओं में भगवान बुद्ध की मृण्मय प्रतिमा नहीं मिली है, जो इस बात की परिचायक है कि यह बौद्ध संस्कृति हीनयानकालीन है। खुदाई में एक मृण्मय मूर्तियाँ मिली है। एक नृत्यरत बाला या दक्षिणी की मूर्ति है, जिसका सिर और पैर गायब है। इसका बायाँ हाथ कूल्हे पर है और दाहिना हाथ वाम स्तन को सम्हालने के लिए छाती पर है। यह मूर्ति जो नग्न रूप में है, तीन लड़ों की मणकों की माला कमर पर धारण किए हुए है। ऐसी ही मूर्तियाँ मथुरा में रेलिंग के स्तम्भों पर मिली हैं जो ईसा पूर्व प्रथम शती की हैं।

 

यह बौद्ध संस्थान कैसे नष्ट हुआ इसकी जानकारी नहीं है। वर्तुलाकार मन्दिर अग्नि से नष्ट हुआ था, क्योंकि उत्खनन में राख मिली है। अशोक स्तम्भ भी सौ टुकड़ों में बँट गया और मठ विनष्ट हो गए। दयाराम साहनी इसका कारण हूणों का आक्रमण बताते हैं।

 

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है—इस प्राचीन नगर का उत्खनन दो बार किया गया है। राजस्थान में उत्तर भारतीय कृष्ण मार्जित मृ‌द्धात्र परम्परा वाली सभ्यता का विराट नगर एक सबल प्रतिनिधि है। सर्वप्रथम साहनी द्वारा किया गया उत्खनन लम्बवत था। इससे महत्त्वपूर्ण सामग्री प्राप्त हुई जिससे यह बात अच्छी तरह प्रमाणित हो गयी कि विराट नगर बौद्ध धर्म से सम्बन्धित एक प्राचीन स्थान था। साहनी के उत्खनन के पूर्व कनिंघम ने दो खाइयों को खुदवाकर परीक्षण के तौर पर उत्खनन कार्य करवाया था। साहनी के उत्खनन में जो प्राचीन भवन मिला था उसका कुछ उल्लेख पूर्व में किया जा चुका है। यह भवन 27 फीट 2 इंच के घेरे में था, जिसके चारों ओर एक वृत्ताकार मार्ग था जो 7 फीट 3 इंच चौड़ा था। इस भवन का निकास द्वार पूर्वाभिमुख था, जिसके निकट 2 फीट चौड़ा बरामदा था। उत्खनन से जो सामग्री प्रकाश में आयी, उससे प्रमाणित होता है कि बैराठ मौर्य साम्राज्य का एक भाग रहा है। यह ईसा पूर्व तीसरी शती से ईसा की प्रथम शती तक एक बौद्ध संस्थान के रूप में प्रसिद्ध भी रहा है। अशोक के शिलालेख, स्तम्भ, मठ, वर्तुलाकार मन्दिर और दूसरी पुरातात्त्विक वस्तुएँ बौद्ध धर्म पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालती हैं। इस स्थान पर प्राचीनकाल में बड़ी संख्या में बौद्ध साधु और धर्म से सम्बन्धित लोग रहते थे। यहाँ से प्राप्त शिलालेखों से अप्रत्यक्ष रूप से यह प्रमाणित होता है। बौद्ध स्मृति चिह्नों की विद्यमानता से भी इसकी पुष्टि होती है।

 

प्राचीन बौद्ध स्मृति चिह्न दो चबूतरों पर विभाजित हैं। एक ऊपरी और दूसरा नीचे का चबूतरा है। दोनों तक पहुँचने के लिए चौड़ी सीढ़ियाँ बनी हैं। ये सीढ़ियाँ असाधारण रूप से वृहत् ईंटों की बनी हुई हैं। ऊपरी चबूतरे पर अशोक के समय में एक बौद्ध मठ बना हुआ था, इस मठ का सर्वाधिक सुरक्षित भाग पूर्व दिशा में है, जहाँ कोठरियों की एक दुहरी पंक्ति है। कोठरियों की संख्या छः सात है। ये एकान्तर रूप से बड़ी और छोटी हैं। बड़ी कोठरी एक बौद्ध भिक्षु के आवास के लायक है। इन कोठरियों की ईंटों को मिट्टी के चूने से जोड़ा गया है। इनके बाहरी एवं भीतरी दोनों भागों में सफेदी की परत है। इनकी त्रिअंकी छतें जली हुई लकड़ी और मृदा निर्मित टायलों से आच्छादित हैं। विराटनगर की खुदाई से यह बात भी ज्ञात हुई है कि मठ के पास एक लोहे का कारखाना स्थित था। इसमें मठ के लोगों की आवश्यकता की पूर्ति के लिए लोहे के औजार बनाए जाते थे। लोहे के मुड़े हुए टुकड़े, कीलियाँ, फिश प्लेटें, जिन पर कीलियाँ लगी थीं आदि बड़ी संख्या में पाए गए हैं। एक तांबे की छड़ भी जो दोनों किनारों पर गहरी थी यहाँ से प्राप्त हुई है जो सम्भवतः कान का मैल निकालने के काम आती थी। लोहे की और भी कई प्रकार की वस्तुएँ यहाँ से प्राप्त हुई हैं।

 

यहाँ से बहुत बड़ी संख्या में विभिन्न माप की कीलें, दीवार पुष्ट करने की छोटी छड़ें, बड़े आकार की लोहे की ऐसी पट्टियाँ जिनके कीलें उनके चौड़े किनारों पर जड़ी हुई थी, लोहे की रेती, धातु के फीतों की गठरी और केवल एक बाण का अग्र भाग एवं सूई प्राप्त हुई है। इन वस्तुओं की प्राप्ति स्थान से थोड़ी दूरी पर एक चिकना चुनार पत्थर का बट्टा भी प्राप्त हुआ है। मन्दिर की उत्तरी दिशा की खाई से मिट्टी के घड़े ऊपरी किनारे का वह भाग भी प्राप्त हुआ जिस पर ब्राह्मी लिपि में एक लेख अंकित है।

 

विराट नगर का दूसरा उत्खनन नीलरत्न बैनर्जी और कैलाशनाथ दीक्षित द्वारा नवीनतम तकनीकों के आधार पर किया था। इस खुदाई से धूसर चित्रित मृ‌द्पात्र, उत्तर भारतीय कृष्ण मार्जित मृद्पात्र तथा प्राचीन युग के महत्त्वपूर्ण अवशेष प्राप्त हुए थे। इस खुदाई से चार स्तर प्रकाश में आए, जिनसे चार विभिन्न युगीन संस्कृतियों पर प्रकाश पड़ा। सबसे पहले रहने वाले लोग चित्रित सलेटी पात्रों का प्रयोग करते थे। इसके बाद उत्तरी काल पालिश वाले पात्रों का प्रयोग करने वाले लोग थे। तीसरे स्तर से ईसा की प्रारम्भिक युगीन संस्कृति का पता उस युग के पात्रों से हुआ। चौथे स्तर से मध्ययुगीन चमकीली वार्निश वाले पात्रों की उपलब्धि हुई। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्नेसांग 634 ई. में बैराठ में आया था। उसने यहाँ आठ बौद्ध मठ देखे थे।

 

वर्तमान बैराठ नगर जयपुर जिले की बैराठ तहसील का एक भू-भाग है। वर्तमान बैराठ नगर प्राचीन बैराठ के स्थान पर नया बसा है। मध्यकाल में यहाँ मुगलों द्वारा एक टकसाल खोली गयी थे, जहाँ तांबे के सिक्के ढलते थे। मुगल बाग, ईदगाह और कुछ अन्य भवन उस काल में निर्मित हुए थे। मुगल बाग का विशाल द्वार आज भी विद्यमान है। विराट नगर के आस-पास की पहाड़ियों में कई गुफाएँ अवस्थित हैं, जिनमें गणेशगिरि की गुफाएँ, भीमसेन की डूंगरी की गुफाएँ प्रसिद्ध हैं। पुराना विराट नगर सम्भवतः कई सदियों तक उजड़ा रहा था। इस बात की प्रबल सम्भावना है कि यह अकबर के काल में पुनर्स्थापित हुआ।

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