
राजस्थान के अलवर जिले में अलवर-जयपुर मार्ग पर सरिस्का अभयारण्य के पास बाबा भर्तृहरि की समाधि बनी हुई है, जहां वर्ष में दो बार लक्खी मेला भरता है। यहां भाद्रपद शुक्ल अष्टमी और श्रावण शुक्ल अष्टमी को बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं। इन दिनों में यह स्थान बाबा की जय-जयकार से गूंज उठता है और राजस्थानी संस्कृति मुखरित हो जाती है। इस मेले में ज्यादातर मीणा, गुर्जर, अहीर, जाट और बागड़ा जातियों के लोग सम्मिलित होते हैं। इसमें राजस्थान के अलावा हरियाणा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, पंजाब आदि प्रदेशों से श्रद्धालु बाबा में अपनी आस्था जताने के लिए आते हैं।
बाबा भर्तृहरि का मेला लघु कुंभ के समान लगता है जिसमें देश के कोने-कोने से साधु-संत और बाबा लोग पहुंचकर अपने धूणे रमाते हैं। हाथों में चिमटा-कमंडल, शरीर पर राख लपेटे लंबी-लंबी दाढ़ी और लंबे बालों वाले सैंकड़ों कनफटे बाबाओं की उपस्थिति से यह स्थान कुंभ की भांति जीवंत हो उठता है। मेले में आई औरतें नये-नये वस्त्र धारण करके राजस्थानी लोकगीतों की धुनों पर नाचती-गाती हैं जिससे यह पूरी घाटी उनके गीतों से गुंजारित हो उठती है। ऐसा लगता है कि जैसे संपूर्ण अभयारण्य एकाएक मांगलिक गीतों के मधुर स्वर से मुखरित होकर नये रूप में रूपायित हो गया है।

वर्षा ऋतु के भाद्रपद में लगने वाले मेले की तो बात ही अलग होती है। इस समय समूचा परिवेश बेहद रमणीक हो जाता है और बाबा की समाधि के चारों तरफ के पहाड़ व बीच का समतल मैदान हरियाली तथा फूलों से आच्छादित होकर मन को मोह लेता है। दूर-दूर से यात्री इस स्थान की नैसर्गिकता का आनंद लेने के लिये आते हैं और पिकनिक पार्टियों का तांता लग जाता है। इस प्रकार बाबा भर्तृहरि का मेला धार्मिक और पर्यटन दोनों दृष्टियों से बेहद महत्वपूर्ण है।