राजस्थानी लोक साहित्य में बाल-कथाओं का विशिष्ट महत्व है। इन कथाओं के माध्यम से बालकों में नैतिकता, वीरता, सच्चाई और परोपकार जैसे उदात्त गुणों का विकास किया जाता है। बाल-कथाओं में व्यक्तित्व विकास में सहायक उक्त गुणों को सहज एवं मनोरंजनात्मक कथा-शैली में प्रस्तुत किया जाता है। इन कथाओं की भाषा सरल, तुकबंदीनुमा और मुदित करने वाली होती है। इन कथाओं के अधिकतर पात्र पशु-पक्षी, राजकुमार-राजकुमारी, छोटे बालक आदि होते हैं। बाल-कथाओं में भरा वाणी-विलास या सरस वाक्य, सूत्र और गीत-गान बच्चों के चरित्र-निर्माण में काफी सहायक होता है। ये कथाएं उनकी भावी जीवन यात्रा के मार्गदर्शक और शिक्षण का कार्य करती है।
राजस्थानी लोक साहित्य में बाल-कथाओं का विशाल भण्डार मिलता है। ये कथाएं क्रम संवृद्ध होती हैं जिनमें खास गति, क्रम और जिज्ञासु-वृत्ति समाहित होती है। इनकी कथा-संरचना बाल-सुलभ मनोवृत्ति के अनुकूल मनौवैज्ञानिकता से भरी-पूरी है। ग्राम्य जीवन में संध्या के समय बूढ़ी दादी या नानी छोटे बच्चों का मन बहलाने के लिए बाल-कथाएं सुनाती हैं। प्रमुख राजस्थानी बाल-कथाओं में सयानी बिल्ली, मोर की कथा, कौए और चिड़िया की कथा, घोड़े के सवार की कथा, चतुर चूहे की कथा आदि प्रमुख हैं।