राजस्थान के अजमेर शहर में गरीबों, पीड़ितों और बेसहारों के सच्चे हिमायती व मसीहा गरीब नवाज हजरत ख्वाजा मुइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह अजमेर शरीफ़ भारत की धर्मनिरपेक्ष एवं साम्प्रदायिक सद्भाव की अनूठी मिसाल है। यहां लगने वाले उर्स के दौरान सभी धर्मों के लोग आकर ख्वाजा साहब के प्रति अपनी आस्था जताते हैं।
मुइनुद्दीन हसन का जन्म, बचपन और शिक्षा-दीक्षा
ख्वाजा चिश्ती के जन्म के बारे में दो मान्यताएं प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार उनका जन्म 15 मार्च, 1136 ई. को हुआ था जबकि दूसरी धारणा यह है कि वे 1142 में जन्मे थे। उनका जन्म स्थान फारस का संजर ग्राम था। इनके पिता का नाम हजरत ग्यासुद्दीन और माता का नाम बीबी उम्मुलवरा था। बचपन में इनका नाम मुइनुद्दीन हसन था। ये बाल्यावस्था से ही दयालु और उदार स्वभाव के थे। इनकी दरियादिली से जुड़े अनेक प्रसंग लोक में प्रचलित हैं। ये अपने हिस्से का पीने का दूध अमूमन दूसरे बच्चों को पिला देते थे। एक बार तो उन्होंने ईद में मिले नए कपड़े एक अंधे बच्चे को दान कर दिए थे।
मुइनुद्दीन हसन की शुरुआती शिक्षा-दीक्षा घर पर ही हुई। वे काफी प्रतिभावान थे और मात्र नौ वर्ष की आयु में ही उन्होंने ‘कुरआन मजीद’ कंठस्थ कर ली थी। इसके बाद उन्हें संजर के मदरसे में आगे की पढ़ाई के लिए दाखिल करवाया गया। वे जब पंद्रह साल के थे तो उनके पिता ग्यासुद्दीन का देहांत हो गया। इसके बाद घर में पारिवारिक संपति का बंटवारा हुआ और मुइनुद्दीन के हिस्से में एक घरेलू बाग व चक्की आई। इन दोनों पर काम करके वे घर का गुजारा चलाते थे।
घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ आने के बाद भी इनका बचपन वाला उदार स्वभाव तनिक भी नहीं बदला और ये सीमित आय होने के बाद भी पीरों-फकीरों व संतों को सम्मान के साथ अपने घर पर भोजन आदि करवाते थे। एक दिन जब ये अपने बगीचे में पौधों में पानी दे रहे थे तभी शेख इब्राहिम कंदोजी नामक बेहद सम्मानित मनुष्य इनके बगीचे में आए। मुइनुद्दीन ने जैसे ही उन्हें देखा तो वे तुरंत उनके पास पहुंचे और उनको छायादार वृक्ष की छांव में बैठाकर रसीले अंगूर का गुच्छा तोड़कर खाने के लिए दिया। शेख साहब युवा मुइनुद्दीन से खूब प्रभावित हुए और उनकी भक्ति भावना से मंत्रमुग्ध होकर अपनी जेब से खली का एक टुकड़ा उनको खिलाया। ज्यों ही मुइनुद्दीन हसन ने यह खली का टुकड़ा चबाया तो उनमें संसार के प्रति विरक्ति का भाव पैदा हो गया। इस घटना के बाद मुइनुद्दीन ने अपने हिस्से के बाग व चक्की को बेचकर उससे मिले धन को गरीबों में बांट दिया और ईश्वर की तलाश में निकल गए।
मुइनुद्दीन हसन का आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश
मुइनुद्दीन हसन ने ईश्वर और सत्य की खोज में सन 1150 ई. से अपना सफर शुरु किया। इस दौरान उन्होंने सन 1150 से 1155 ई. के बीच समरकंद व बुखारा के धार्मिक संस्थानों में रहकर धार्मिक शिक्षा हासिल की। यहां से शिक्षा हासिल करने के बाद भी उनकी ज्ञान-पिपासा शांत नहीं हुई और वे इस्लामिक अध्ययन के सबसे बड़े केंद्र बगदाद में हजरत उस्मान हारून के यहां तालीम लेने के लिए पहुंचे। बाद में ये अपने गुरु के उत्तराधिकारी भी बने।
ख्वाजा मुइनुद्दीन की यात्राएं
इसके बाद में वे बगदाद से शाम और किरमान देशों की यात्रा पर निकले। सन 1160 में मुइनुद्दीन बुखारा पहुंचे। इसके बाद उन्होंने अनेक स्थानों का भ्रमण किया जिनमें लाहौर, गजनैन और ब्लख इस्तराबाद आदि प्रमुख हैं। इसके बाद वे पुन: बगदाद पहुंचे। यहां कई धार्मिक विद्वान उनका सानिध्य हासिल करने की प्रतीक्षा कर रहे थे। इनमें से एक शेख शहाबुद्दीन उमर सोहरवर्दी जैसे बड़े विद्वान भी शामिल थे। शेख शहाबुद्दीन जब ख्वाजा मुइनुद्दीन की संगत में बैठे तो उन्हें अलौकिक अनुभव हासिल हुआ और वे उनके मुरीद हो गए।
शेख मुइनुद्दीन का हिन्दुस्तान आना और अजमेर में स्थाई प्रवास करना
सन 1190 में ख्वाजा मुइनुद्दीन ने मदीना मुनव्वरा से बगदाद होते हुए हिंदुस्तान का सफर आरंभ किया। इसी यात्रा के दौरान उन्होंने शम्सुद्दीन अल्तमश को सुल्तान बनने का आशीर्वाद दिया जो बाद में फलीभूत भी हुआ। भारत में घूमते-घूमते ये सन 1191 में अजमेर पहुंचे और वहां के कोट इलाके में अपने रहने लिए जगह तय की। इतिहासकारों का मानना है कि उस समय यहां सम्राट पृथ्वीराज चौहान का शासन था। यहां रहने के दौरान ख्वाजा मुइनुद्दीन की प्रतिष्ठा बढ़ती गई और प्रत्येक जाति-धर्म का व्यक्ति इनके विचारों से प्रभावित होने लगा। इस दौरान वे आसपास के क्षेत्रों में भी भ्रमण करके धार्मिक शिक्षाएं देते रहे। कहा जाता है कि उन्होंने ही शहाबुद्दीन गौरी को शासक बनने का आशीर्वाद दिया था।
अजमेर रहते समय इनके स्वभाव में पहले से अधिक उदारता आ गई और वे यहां के प्रत्येक इंसान के दुख-सुख में शामिल होने लगे। इनके व्यक्तित्व में मानवता और मित्रता का ऐसा मेल था जिसमें संकीर्णता का कोई स्थान नहीं था। ख्वाजा मुइनुद्दीन अपनी जिंदगी बेहद साधारण तरीके से व्यतीत करते थे। फटे कपड़े व एक चटाई का बिस्तर मात्र ही उनकी संपति थी। कथनी और करनी में फर्क नहीं होने के कारण साधारण लोग इनके उपदेश सुनने के लिए खिंचे चले आते थे। उन्होंने इस्लाम धर्म के मूलभूत सिद्धातों को सरल भाषा में आमजन को समझाया और इस्लाम का उदार रूप प्रस्तुत किया।
ख्वाजा साहिब का इंतकाल
ख्वाजा मुइनुद्दीन हसन चिश्ती का इंतकाल कब हुआ, इस बारे में दो धारणाएं प्रचलित हैं। पहली मान्यता के मुताबिक ख्वाजा साहेब 21 मई, 1230 को जन्नतनशीं हुए थे जबकि दूसरी धारणा यह है कि ख्वाजा साहब का देहांत 1236 को हुआ था।
ख्वाजा साहब की दरगाह पर लगने वाला मेला ‘उर्स’ कहा जाता है और यहां आने वाले श्रद्धालु ‘जायरीन’ नाम से जाने जाते हैं। यह उर्स इस्लामी कैलेंडर के अनुसार पहली रज्जब से लेकर छठी रज्जब के अनुसार आयोजित होता है। इस दौरान अनेक कव्वाल गायक अपनी मंडली के साथ आकर ख्वाजा साहब का गुणगान करते हैं।
इस उर्स में देश-विदेश से जायरीन आकर अपनी मन्नत मांगते हैं और पूरी होने पर ख्वाजा साहब की दरगाह पर आकर सजदा करते हैं। दरगाह में जन्नती दरवाजे के पास लगी देग में बने प्रसाद को आने वाले श्रद्धालुओं में बांटा जाता है।
अजमेर शरीफ की दरगाह में मन्नत मांगने और उसके पूरा होने का इतिहास बहुत पुराना है। मुगल बादशाह अकबर भी यहां हर साल आते थे। अनेक राजा-महाराजा और राजदरबारी समय-समय पर दरगाह पहुंचकर ख्वाजा साहब के प्रति अपनी श्रद्धा जताते थे।
आज भी यह दौर जारी है। उर्स के दौरान दरगाह पर अनेक राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा चादर समर्पित की जाती है। यह ख्वाजा साहब के प्रति आमजन में लोकप्रियता और श्रद्धा का प्रतीक है। ख्वाजा अजमेरी भारत में साम्प्रदायिक सद्भभाव और सर्वधर्म समभाव के सबसे बड़े व आस्था केन्द्र के रूप में जाने जाते हैं।