दोहा

वरणि राजगढ़ गढ़ कह्यौ, जोजन येक मझरि।
जल-खाई ऊंचे अलग, द्वार च्यारि दिसि च्यारि॥

चौपाई

प्रथम द्वार कहियत पछिम धर। दूजै दखिण तीजै ऊत्तर।
चौथे पूरब मधि पहचानौ। ठाम ठीक ये पोरि प्रवानौ॥

छन्द त्रोटक

चलि आवत भीर चहु दिस की। गजराज अवाज चहु दिस की।
धरि ऊपर पातलराव यसो। बल विक्रम भूपति भोज तिसो।
असुपति गजपति आतकते। नर नोकर पाय लगंति किते।
सइद सेख मुगल पठाण। हीदु हीदवान दिली तुरकान।
सही सुरपति पुरिस पठान। नरूधर रै गढ़ राजसथान।
तठै महला छवि घाटसु घाटवणे। जालियां वंगला सुझरोख गड़े।
मनु चतरंग चतेर जड़े। पड़दा अतिरंग सुरंग पड़े।
बिछायत मसंद गीलम गदी। अतरा खतरा खसवाय हदी।
नरुकुलरै पति पातिलराव रजै। घडीयालस नोवत वार वजै।
नगरी मज बंस छतीस खसै। मग आवत जावत ढाल बसै।
यहो ऊगत प्रात कितेक नरै। सिर नाय सवाय सलाम करै।
हठ चौहट वट वजार वणे। अति सुंदर मंदिर मध्य घणे।
वगवाय वणे सतलाब तरै। घण पछिम कोट कलोल करै।
कहु कडीय तोवसु ठथ थिरै। कहूं गजराज सवाजि फिरै।
कहू धुन ध्यान स राग रंगे। कहू रजपूतसु थट सगै।
यते भनियेस प्रतछि प्रभाव। सुछजि नरपति पालितराव॥

स्रोत
  • पोथी : प्रताप-रासो ,
  • सिरजक : जाचीक जीवण ,
  • संपादक : मोतीलाल गुप्त ,
  • प्रकाशक : राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर ,
  • संस्करण : द्वितीय
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