॥ दुहा॥
सोम विराजत शीश पर, जटा विराजत गंग।
बर्फानी बाबो जबर, छक छक पीवे भंग॥

कर डमरू त्रयशूळ धर, कनकुंडल गळ शेष।
नंदी चढ़ झट आवजे, बाघंबरी महेश॥

॥ छंद नाराच॥ 

गळे भुजंग कुंडळी रुद्राक्ष माळ धारिया।
सजाय मुंड माळिका असंख मेख मारिया।
भभूत सुं नहाय तूं मशांण घाट रम्मिये।
नमो शिवाय शंकराय आदिनाथ उम्मिये॥

नशे मलंग तांडवं छमा छमंक नच्चिये।
धुजे धरा धड़ं धड़ं घड़ंग नभ्भ गज्जिये।
विराज तूं हिमालिये जहां जहांन जम्मिये।
नमो शिवाय शंकराय आदिनाथ उम्मिये॥

गिरीश शीश सोहते मयंक गंग निर्झरी।
घमंड मेट काम रो कियो अनंग कर्परी।
दनू मनूज देवता अखंड लोक नम्मिये।
नमो नमो त्रिलोचना नमोज नाथ उम्मिये॥
स्रोत
  • सिरजक : सत्येन्द्र सिंह चारण झोरड़ा ,
  • प्रकाशक : कवि रै हाथां चुणियोड़ी
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