म्हारी गत थूं, आगत है थूं,

आज बण साम्हीं है थूं

आखर-आखर पसरयो थूं,

मन-पोथी नामी है थूं

घाल दावणो म्हारै पगां, हाथां धर दी

थारै नांव री पोथी मिजाजी वगत

कदैई नीं मांग्यो थारै सिवा बगत सूं कीं

पण हर बार म्हनैं ठगी

पढूं, गुणूं, बुनूं बस थारो नांव

थिर बांध्यां राखूं बधता डग,

जिका पूगै थारै धाम री छांव

अेकली, उदास, मून हूं म्हैं।

पण हिवड़ै में हाहाकार मच्यो

ठा नीं थारै साथै कद-कियां

अेक भाव-संसार।

काळजै रै आंगणियै रच्यो

हाथ नैं हाथ नीं सूझै जैड़ै अंधारै

थारै नांव रा आखर

दिवला बण मनड़ै रम

राग सुणावै!

थारै साथै जीया पळ-छिण

बण पुसब पूजा रा, जीवण नैं मैकावै।

स्रोत
  • पोथी : राजस्थली लोक चेतना री राजस्थानी तिमाही ,
  • सिरजक : अनिला राखेचा ,
  • संपादक : श्याम महर्षि ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी साहित्य-संस्कृति पीठ
जुड़्योड़ा विसै