नींद नैं बेच'र,

पिरोयो छै तू

म्हनै सबदा मं।

यूं ही थोड़ी

जावै छै

मझरातां थूं

सुपणां मं।

घणों मोल चुकायो छै

म्हनै

अर काटी छै

पलकां नै,

बना झपकायां

कतनी रातां,

चकोरी की नांईं

बिरह कै

लारां-लारां,

चालतां-चालतां बी

म्हनै,

पकड़ मैल्यो छै,

अेक आस को

पल्लौ।

काळी-कट्ट

रात को।

कै कदी तो

ओस का मोती ल्यां,

होवैगो

सई

तड़काव।

स्रोत
  • सिरजक : मंजू कुमारी मेघवाल ,
  • प्रकाशक : कवि रै हाथां चुणियोड़ी
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