जूण भलां खुसियां सूं भरलै,

लोगां री दौराई नैं हरलै

मंड जावै इतियास बगत रो,

इसड़ो थूं कीं कारज करलै

मिनखां री थूं फोड़’र आंख्या,

क्यूं ढांढां रो चारो चरलै

रपट मती आथूणी दिस थूं,

धीरज हिवड़ै में धरलै

मरणो अवस पड़ैला आयां,

करियोड़ा पापां सूं डरलै

स्रोत
  • पोथी : राजस्थली लोकचेतना री राजस्थानी तिमाही ,
  • सिरजक : अब्दुल समद ‘राही’ ,
  • संपादक : श्याम महर्षि ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी साहित्य-संस्कृति पीठ
जुड़्योड़ा विसै