पटहथ पतसाह मयंद मोताहळ,

पै भांजंतां जु भुय पड़िया।

दूद दीठा मैं चक्रवत चुणता,

कळत रैस आभरण किया॥

किलम कुंजर नर केहर जुवा कर,

पग पग पेखीजै पड़िया।

अविध सु अधपत अधकंठ अबळा,

जसहड़ संभ्रम अछै जड़िया॥

सादूळा तै जसहड़ संभ्रम,

भिड़ भद्रजाती असुर भगा।

दीसै रायहरै दुजणसल,

मोती महिळा मवड़ लगा॥

स्रोत
  • पोथी : मुहता नैणसीं री ख्यात, भाग 2 ,
  • सिरजक : बोहड़ बीठू
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