सावज सूं समर चौगुणी सूरत, गुणां लाय सूं लाख गुणी।

कोड़ां गुणां भांय सूं करड़ी, त्रगुणी तड़ता तेज तणी।

अरजण तणा बांण सूं अफरी, भीम गदा सूं भारी।

चकर विसन सूं तेज चौगुणौ, खळां लागणी खारी।

भीसम द्रोण बांण सूं भारी, वासक वजर वडाळी।

ऊदौ रैफल लिये जद ऊँची, करां खपर ले काळी।

कर तणै त्रसूळ सारसी, फेर फरस री फरसी।

कुंदावाळी ‘मधकर’ करगां, सगत त्रसूळां सरसी।

हळधर तणै हाथ रा हळ ज्यूं, डंड काळरा दावै।

सेसनाग री फूंक सरीखी, वाड़व ताप बतावै।

अगनी तीजै नेत्र ईस री, पावक प्रळ परीखी।

मंतराँ मूंठ हणूं री मूंकी, सगत अमोघ सरीखी।

फीलां थाट चौवड़ां फूटे, घोर पयाळां घालै।

छूटां प्रांण खळां रा छूटे, झड़क किला नह झालै।

सुत रूपाळ करै ज्यां सामी, काळ जिकां भ्रख कीधा।

ऐह बन्दूक घड़ै ने अळगा, लुकबदीन कर लिना।

ससत्रां इताँ सिरोमण सारां, कवियण केती क्रीत कथै।

अवरां तणी बंदूकां अवारां ‘मधकर’ री बंदूक मथै॥

स्रोत
  • पोथी : दरजी मयाराम री बात ,
  • सिरजक : बुधजी आशिया ,
  • संपादक : शक्तिदान कविया